तुर्की की 500 साल पूरानी मस्जिद में 70 साल बाद गूजेंगी अल्लाहू अकबर की सदाएँ, एर्दोगान ने किया ऐलान

तुर्की के राष्ट्रपति एर्दो’गा’न इंटरनेशनल मीडिया और सुर्खिया लागातर बटोर रहे है । उनके समर्थकों की माने तो एर्दो’गन ख़िलाफ़’ते उस्मा’नि’या की राह पर चल पड़े है क्योंकि एर्दो’गन ने 86 साल से बन्द पड़ी म’स्जि’द को फिर से शुरू किया और तुर्की को समुंदर में 320 बिलियन क्यूबिक मिटर्स गैस निकलने के बाद ए’र्दो’गा’न की हर तरफ तारीफ हो रही है। और तुर्की जनता सड़को पर निकल आई है ।

बीते दिनों तुर्की की अदा’ल’त ने ह’गिया सो’फिया म्यूजियम से मस्जिद दर्ज दिए जाने के बाद सभी मुस्लिम देशों में जश्न का माहौल मनाया गया था। 86 साल बाद आए इस फैसले की वजह से तुर्की शहर इस्तंबूल में सभी लोगो ने ह’गिया में पांच वक्त की नमा’ज अदा की जा रही है। हगिया के फैसले आने के बाद दुनियाभर में नई बहस उन म’स्जिदों के लिए शुरू हो गई है जो निर्माण तो मस्जि’द के तोर पर तो शुरू हुई है लेकिन अब उनकी स्थिति कुछ और ही है।

chora church news

एर्दो’गान ने ऐतेहासिक चोरा चर्च को शुक्रवार को मस्जि’द में बदलने का फैसला किया है। यह कदम ह’गिया सोफि’या को म’स्जिद में बदलने के एक महीने बाद ही उठाया गया है।बता दे कि चौथी सदी के इस प्राचीन चर्च को ओ’टो’मन स’म्राज्य के दौर में मस्जि’द में बदल दिया गया था।

1945 में तुर्की सर’कार के द्वारा इसे म्यूजियम के तौर पर नामांकित किया गया था। 1958 में इसे एक म्यूजि’यम के तौर पर ही आम जनता के लिए खोल दिया गया था। आपको बता दे कि पिछके साल ही अ’दा’ल’त ने चो’रा चर्च को म्यू’जिय’म में बदलने वाले 1945 के सर’का’री फैसले को खारिज कर दिया था।

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न्यूज़ एजेंसी के रिपोर्ट के मुताबिक, शुक्रवार को ए’र्दोगा’न द्वारा ह’स्ता’क्षरि’त और तुर्की के आधिका’रिक राजपत्र में घोषणा की गई है। म’स्जि’द को इ’बाद’त के लिए खोल दिया गया है।

हालांकि इस आदेश में इस बात को नही बताया है कि न’मा’ज कब अदा होगी और वहां पर लगी ई’सा’ई कलाकृतियों के लिए क्या व्यवस्था की जाएगी।तुर्की के राष्ट्रपति ने कहा था कि हफ़ि’या को बदलने के बाद म’स्जि’दे अ’ल अ’क्सा भी इ’जरा’इल के गिर’फ्त से मुक्त होगी।

बता दे कि बीते दिनों ही यूएई के शरजाह सुल्तान बिन मोहम्म’द अ’ल का’सिमी ने स्पेन में कुर्तु’बा म’स्जि’द जो च’र्च को वापस लेने की मांग की है। इस म’स्जिद की तामीर 200 साल मपुरी हुई थी। जो 1931 तक दुनिया की सबसे बड़ी म’स्जिद हुआ करती थी।

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