फ़ैज़ की मशहूर नज़्म ‘..हम देखेंगे लाज़िम है’ वि’वाद पर बोले जावेद अख्तर, फ़ैज़ की नज़्म को हि’न्दूविरो’धी कहना बे’तुका और ….

शायर किसे कहते है, शायर तो वह होता है जो नज्म भी पढ़े, गजल भी , मर्सिया भी, खाका का बयान करें । हमारे देश मे महशूर शायर जो रह चुके है सबसे पहले नाम आता है अल्लामा इकबाल का , जिन्होंने सारे जहाँ इसे अच्छा हिंदुस्तान हमारा लिखा । कई मिल्ली तराने दिए जिसमे ‘लब पे आती है दुआ, बन के तम्मना मेरी’ प्रमुख तौर पर विश्व प्रसिद् है । अगर हम शायरों की बात करेंगे तो लिस्ट बड़ी हो जाएगी लेकिन आपको अल्ताफ हुसैन हाली, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ जैसे शायर कम ही देखने को मिलते है ।

इन शायरों ने कई नज्में लिखी है। आज हम आपको बताने जा रहे है फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के बारे में । इनकी नज्म है हम देखेंगे लाज़िम है कि हम भी देखेंगे जो इन दिनों काफी सुर्खियां बटौर रही है । इनकी यह नज्म हाल ही में हो रहे CAA के खिलाफ विरोध में जामिया और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के छात्र और छात्राए गा रहे है। फ़ैज़ की यह नज्म बढ़ते विवाद के बाद आईआईटी कानपुर ने एक स’मिति गठि’त की है जो तय करेगी कि इसकी नज्म’ हिं’दू वि’रोधी है कि नही।

फ़ैज़ की नज्म को फेकल्टी के कुछ सदस्यों ने इसे हि’न्दू वि’रो’धी बताया है। बता दे कि मशहूर शायर फ़ैज़ ने यह नज्म जिया उल हक के सन्दर्भ में लिखी थी। यह पा’कि’स्ता’न में सै’न्य शा’सन के वि’रो’ध में लिखी गई थी। फ़ैज़ की यह नज्म तब प्रसिद्ध जब इसे गुलूकारा इकबाल बानो ने गाया था। Rekhta पर दी गई जानकारी मुताबिक बताया गया है कि 1985 में जनरल जिया उल हक के फरमान के तहत और’तों के साड़ी पहनने पर पा’बं’दी लगा दी थी।

गुलुकरा इकबाल बानो ने एह’तियाज द’र्ज करते हुए ला’हौर के एक स्टेडि’यम में का’ले रंग की साड़ी पहनकर 50000 लोगों के सामने फ़ै’ज़ की यह नज्म गाई थी। फ़ैज़ का जन्म 13 फरवरी, 1911में पंजाब के सिया’लकोट जिले में हुआ था। फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के पिता एक चर’वाहा थे। फ़ैज़ ब्रिटि’श भारतीय सेना में भ’र्ती हुए और सेवा’एं दी।

लेकिन वि’भाजन के वक्त उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया और ला’हौर आ गए। लाहौर वा’प’स आने के बाद उन्होंने ‘इम’रोज और पा’किस्ता’न टाइम्स का सम्पादन किया। 1977 में तत्कालीन आर्मी चीफ जिया उल हक ने पा’कि’स्तान में त’ख्ता प’लट किया। जिया उल हक के शा’स’न के खिलाफ फैज ने ‘हम देखेंगे’ न’ज्म लिखी थी।

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