किसी ज़माने में अंतरिक्ष विज्ञान से लेकर केमेस्ट्री, मेडिकल साइंस में उस्ताद थे मुसलमान, आविष्कारों से बजाजा था डंका

हम कल क्या थे इस बात को हम खुद भी नही जानते है। जब कि यह कल का दिन अभी कल ही गुज’रा है। इस न’स्ल के बारे में जो आज भी इस’की आह’त तो सु’नाई देती है। क्या आपको यकी’न आएगा कि आने उस कल ओर जिस में अंत’रिक्ष, के’मेस्ट्री, और

मे’डिकल सा’इंस में पूरे यूरो’प के उ’स्ताद थे। जिस कल में इ’माम राजी की मेडिकल साइंस पर लिखी हुई कि’ताब आज भी मिसा’ल बनी हुई है। जिस कल में ईसाई बाद’शाह लुई को अरब के मुस’लमान मुस’न्निफ़ की कि’ताब की जरूरत पड़ी तो सिर्फ कुछ ही वक्त के लिए

muslim scientists and their inventions

लेने पर ब’तौर ज’मानत एक बड़ी रक’म इस को जमा क’रनी पड़ी।जिस कल में पूरे यूरोप में सिर्फ एक ला’इ’ब्रेरी थी। ला’इब्रेरी क्या थी, एक अलमारी थी। जिस में सिर्फ एक किता’ब थी वो भी अंग्रे’जो में नही, अरबी में ईसा’ई की नही। मु’सल’मान की जिस कल में यूरो’प में स’र्जरी होती थी ने

हो’श करके नही बल्कि ऑप’रेटर थ्रिये’टर में न’ही, डॉ’क्टरों की टीम की निग’रानी में नही, इले’क्ट्रॉनिक मशी’नों के सा’ये में न’ही, खुले मैदा’न में, कु’ल्हाड़ी से। बिल्कुल उसी तरह जिस तरह से एल लकड़’हा’रा एक ल’कड़ी को का’टता है।

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बता दे कि सुल्ता’न सलाहु’द्दीन अ’य्यबी के सफ’र उ’स्मान बिन मनक’ज का सफर’नामा न’ही होता तो शायद हम इसी बात को समझ रहे होते की यू’रोप पै’दा ही मशी’नों के साथ हुआ था और वह त’रक्की की गोद मे परवा’न भी चढ़ा है।

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