रूनझुम बेगम: जिंदगी के अंधेरों में संघर्ष का चराग़ जलाने वाली बहादुर महिला

आजा’दी के बाद भारत ने अपने चप्पे चप्पे पर का’नून का राज तो घोषि’त कर दिया लेकिन समाज में अब भी ऐसे अंधेरे कोने है जहाँ का’नू’न का कोई अमल दखल नही है।जहां पर इंसनायित हर रोज रौंदी जाती है।रुनझु’न बेगम भी उन्ही में से एक है।

वह एक गरीब परिवार में पैदा हुई। वह जिस समा’जसे आती है उस समाज में लड़कियों की शादी जल्द ही हो जाती है।लिहाजा उन्होंने साल2007 में मेट्रि’क पास करने के बाद रूनझुन की भी शादी हो गई।उस वक्त वह सिर्फ16साल की थी।

उनकी दो बेटियां हुई। उन्होंने बहुत ही जया स’सुराल में ताने और तरह तरह की बातों को सहा। इसके बाद वह 5 महिनी की ग’र्भ’वती हुई लेकिन सुस’राल वालों ने उनसें मनाग कर दिया।इसके बाद रूनझुन के पास सु’सराल से चले जाने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नही बचा।

इसके बाद 30 रुपए लेकर बस में पहुची उनकी मदद करने के लिए कोई फ’रिश्ता आया। जिसने उनकी मदद की। आश्रम में रही ।9 महिने केबाद रूनझुन के बेटा हुआ। उसे वह लकी कहकर बुलाती थी। रुनझुम ने आश्रम में रहकर ही सिलाई का प्रशिक्षण पूरा किया।

साल 2014 में उन्होंने एक दुकान खोली जिसका नाम लकी टेलर रखा। कुछ ही दिनों में वह पूरे असम और बिहार में फैल गई। उनके पास ऑर्डर आने लगे
वह अपने पति से तलाक ले चुकी है उनकी दोनों बेटियों उनसे दूर है लेकिन आज भी रूनझुन खुद जैसी महिलाओं के 15 परिवार का पेट पल रही है।
उन्हें असम सरकार ने नवाजा है।

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