मिलिए अफगानिस्तान के उस बादशाह से जो भारत में लेकर आया था ‘बासमती चावल’, दिलचस्प है पूरी कहानी

देह’रादून की बास’मती चा’वल का नाम सुनते ही मुंह मे खुशबू, मि’ठास और को’मल चाव’लों के दानों का स्वाद भी भर जाता है। वारिश शाह की हीर रांझा में मिलने वाला यह बास’मती चाव’ल किस तरह से सिर्फ दे’हरादून का हो’कर रह गया।

भारत मे खुशबू’दार चा’वल का अप’ना बहुत ही पुराना इतिहास है। बासमती शब्द का प्रयोग पहले वा’रिस शाह की हीर रांझा से ही मिलता है। भारत के महान चिकि’त्सक शा’स्त्री और श’ल्य चि’कित्सक समय से ही मिलता है।पहले अफ’गान के यु’द्ध मे रा’जा रण’जीत सिंग और अंग्रे’जो की से’ना जीती थी।

the entire history afghanistan colonial era

वहां पर बादशाह दोस्त मोहम्मद खा अपने देश से नि’र्वासित भी हुआ। 1842 में निर्वा’सन के दौरान दोस्त मोह’म्मद को अंग्रे’जो ने म’सूरी में रखा। दोस्त मोहम्मद के लिए अग्रेजो ने मसूरी में बाला हिसए का कि’ला भी बनवाया। बाला हिसार एक पश्तो शब्द है जिसका अर्थ ऊँचा’ई औरपहा’ड़ी पर स्थित किले से है।

बल हिसार की जगह आज भी मौजूद जहां वतर्मान समय मे कोई पब्लिक स्कूल भी चलता है।दोस्त मोह’म्मद खा को खाने का बहुत शौक था। अपने खाने में उसको अपने स्थानीय चावल का स्वाद बिल्कुल भी प’समद नही आया। वह पंजाब क्षेत्र में उगने वाले चावल का आदि हो गया था। दोस्त मोहम्मद ने किसी भी

तरह जुगाड़ ने देहरादून के चावल का बीज अपने क्षेत्र में ले आया।अफ’गानि’स्तान से देहरादून आया बासमती चावल आज नई भौगोलिक परिस्थितियों में ऐसा खिला है कि उसके स्वाद के कसीदे आज भी पढ़े जाते है। आज उनकी गिनती बास’मती चावल के राजा नाम से होती है।

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