टीपू सुल्तान होंगे किताबों से बाहर, जयंती भी नहीं मनेगी, कर्नाटक सीएम येदुरप्पा बोले – टीपू पाठ्यक्रम पढ़ाए जाने लायक़ ….

शेर ए मैसूर टीपू सुलतान के नाम से पूरा देश वाकिफ़ है । उनका जन्म 20 नवंबर 1750 को हुआ। उनके पिता हैदर अली मैसूर के शासक रहे है। जबकि इनकी माता, फातिमा फख्र उन्नीसा कड़प्पा के किले के गवर्नर मीर मोइन उद्दीन की बेटी थी। टीपू सुल्तान जिनको उनकी बहादुरी के कारण टाइगर ऑफ मैसूर के नाम से भी जाना जाता है। इतिहासकार बताते है कि दक्षिणी भारत मे ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी के लिए आखरी और सबसे बड़ी बाधा थे।

हालांकि कर्नाटक की भाजपा सरकार 18 वी शताब्दी के मैसूर टीपू सुल्तान के स्कूली इतिहास की किताबो से सबक हटाने का प्रयास कर रही थी। जिसमे टीपू के खिलाफ दावा किया गया है कि वो अत्या’चा’री था। जबकि इतिहासकारों का कहना है कि वो महान शासक थे, जिसने अच्छे शासक परिचय दिया। भूमि राजस्व प्रणाली आदि में बड़े बदलाव, वह आधुनिक रॉकेट के जनक है।

पूर्व राष्ट्रपति डॉक्टर ऐ पी जे अब्दुल कलाम ने अपनी किताब विंग्स ऑफ फायर में टीपू सुल्तान का जिक्र करते हुए लिखा था टीपू ही दुनिया के पहले मिसाइल मैन थे । उन्होंने सबसे पहले रॉकेट का इस्तेमाल अंग्रेजो के खिलाफ किया था । बताया ये भी जाता है कि अंग्रेज टीपू की तकनीक को ब्रिटेन में ले गए थे । म्यूजियम में रखे हुए रॉकेट गवाही देते है कि टीपू देश के सबसे अच्छे शासकों में से एक रहे है।

इकोनॉमिक टाइम्स में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने बैंकिंग प्रणाली की शुरुआत की थी। जिस में जनता पैसा जमा करती है। वार्षिक आधार पर, वे मूल राशि पर ब्याज प्राप्त करते थे। टीपू सुल्तान वस्तु विनिमय के प्रबल समर्थक थे क्योंकि वे समझते थे कि मुद्रा में व्यापार करने से मैसूर की क्रय शक्ति कम हो जाएगी। पीएसयू प्रणाली – उनके द्वारा यह प्रणाली शुरू की गई थी।

टीपू सुल्तान को आधुनिक रॉकेट के पिता के रूप में जाना जाता है। क्योकि उन्होंने बा’रूद से भरी लोहे की ट्यूब बनाई थी। उन्होंने तोपो का भी निर्माण किया था। उनके समय के जो रॉकेट है वो इंग्लैंड में सुरक्षित रखे हुए है। टीपू सुल्तान के कई देशों जैसे अफ़ग़ानिस्तान, मैसूर, फारस, ओमान,फ्रांस आदि से अच्छे सम्बन्ध थे।22 दिसम्बर 1782 को टीपू सुल्तान मैसूर के शासक बने। उन्होंने फ्रांसीसी अधिकारियों से सै’न्य प्रशिक्षण प्राप्त किया।

15 साल की उम्र में, उन्होंने 1766 में प्रथम मैसूर यु’द्ध में भाग लिया। आज भी देश उनके बलिदान को नहीं भुला है । लेकिन आज कुछ राजनितिक पार्टियां राजनीती के फ़ायदे के लिए उनका वि’रोध करने लगी है। आपको बता दे, टीपू सुल्तान की जयंती और पाठ्यक्रम को लेकर कर्नाटक सीएम येदुरप्पा ने कहा कि टीपू सुल्तान पाठ्यक्रम पढ़ाए जाने लायक नहीं है,यह किताबों से बाहर होगा और जयंती भी नहीं मनेगी। बीजेपी विधायक रंजन ने एक बयान में कहा था कि टीपू सुल्तान ने हज़ारों कोडवा समुदाय और ईसाइयों को इ’स्लाम कुबूल करवाया था। एमएलए रंजन ने ये भी कहा कि टीपू ने अपने शासनकाल में फ़ारसी भाषा को आधिकारिक दर्जा दिया था।

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